मै कहीँ कवि न बन जाऊँ - Mai Kaheen Kavi Na Ban Jaun
मै कहीँ कवि न बन जाऊँ!
रचना करता है, पर
मेरे साथ विपरीत है
जो मेरे साथ व्यतीत है
मैं पहले कवि नही था
कविता ने मेरे जीवन मे
आकर मुझे कवि बनाया
वो बहुत पहले से मेरे पास
आना चाह रही थी
पर मै इस बात से
बिलकुल अनजान था
मैं इसके लिए बिल्कुल भी
तैयार नही था
मुझे लगता था
ऐसा कैसे हो सकता है
की कविता और मेरे पास
एक स्वप्न जैसा था,
मैं बिल्कुल ऐसा ना था
उसके लिए तो
एक झोला, लंबा कुर्ता
बढ़े केश , एक क़लम
उमंग और जोश चाहिए
प्यार भरी सोच चाहिए
कविता मेरे ज़ेहन में
आकर बोली बिल्कुल ग़लत
आप इस विधा में छा सकते हो
आप मुझको पा सकते हो
बस इतना काम है करना
अपने दिलो-दिमाग को टटोलो
फिर अपने अल्फाज़ो को
मोतियों सा पिरो कर बोलो
वो बार बार मेरे ज़ेहन में
आ रही थी,
बार -बार कह रही थी
और एक मैं था
कि टस से मस नही
कभी -कभी लगता था
कि वो आ सकती है
कभी लगता कि मैं
इसके लिए तैयार नही था
जब लगने लगा कि
कविता मेरी हो सकती है
मुझे लगा कि संभव ना हो
उसे संभाल पाना
कविता का कहना था
मुझे समय दो
एक बार मेरे पास बेठो
मुझे अच्छी तरह तो समझो
पहले उसने मुझे लाईन दी
फिर मेने भी कोशिश करके
उसकी लाइन से लाइन
मिलाकर, लाइन दे ही डाली
फिर तो उसकी लाइन, मेरी लाइन,
लाइन पे लाइन बनती गई
और कविता मेरी बन गई
मैं उसका कवि हो गया
- सौरभ गोस्वामी
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